गारे-हिरा में इबादत :- हज़रत खदीजा से शादी के बाद आप घरेलू मामलों से बेफ़िक्र हो गये। पानी और सत्तू
साथ ले जाते और हिरा पहाडी के गार (गुफ़ा) में दिन-रात इबादत में लगे रहते। मक्का शहर से लगभग तीन मील की दूरी पर यह पहाडी पर स्थित है और आज भी मौजुद है। हज़रत खदीजा बहुत मालदार थी इसलिये आपकी गोशा-नशीनी (काम/इबादत/ज़िन्दगी) में कभी दखल नही दिया और न ही तिजारत का कारोबार देखने पर मजबूर किया बल्कि ज़ादे-राह (रास्ते के लिये खाना) तय्यार करके उनको सहूलियत फ़रमाती थीं।
समाज-सुधार कमेटी :- हिरा के गार में इबादत के ज़माने में बअसर लोगों की कमेटी बनाने का मशवरा आप
ही ने दिया था और आप ही की कोशिशों से यह कमेटी अमल में लायी गयी थी। इस कमेटी का मकसद यह था कि मुल्क से फ़ितना व फ़साद खत्म करेंगे, यात्रियों की सुरक्षा करेंगे और गरीबों की मदद करेंगे।
सादिक-अमीन का खिताब :- जब आप की उम्र 35 वर्ष की हुयी तो खान-ए-काबा के निर्माण के बाद
हज-ए-अस्वद के रखने को लेकर कबीलों के दर्मियान परस्पर झगडां होने लगा। मक्का के लोग आप को शुरु ही से अमीन और सादिक जानते-मानते थे, चुनान्चे आप ही के हाथों इस झगडें का समापन कराया और आप ने हिकमत और दुर-अन्देशी से काम लेकर मक्का वालों को एक बहुत बढे अज़ाब से निजात दिलाई।
नबुव्वत-रिसालत :- चांद के साल के हिसाब से चालीस साल एक दिन की आयु में नौ रबीउल अव्वल सन
मीलादी (12 फ़रवरी ६१ ईंसवी) दोशंबा के दिन आप पर पहली वही (सन्देंश) उतरी। उस समय आप गारे-हिरा में थे। नबुव्वत की सूचना मिलते ही सबसे पहले ईमान लाने वालों खदीजा (बीवी) अली (भाई) अबू बक्र (मित्र) ज़ैद बिन हारिसा (गुलाम) शामिल हैं।
दावत-तब्लीग :- तीन वर्ष तक चुपके-चुपके लोगों को इस्लाम की दावत दी। बाद में खुल्लम-खुल्ला दावत देने
लगे। जहां कोई खडा-बैठा मिल जाता, या कोई भीड नज़र आती, वहीं जाकर तब्लीग करने लगे।
कुंबे में तब्लीग :- एक रोज़ सब रिश्ते-दारों को खाने पर जमा किया। सब ही बनी हाशिम कबीले के थे।
उनकी तादाद चालीस के लग-भग थी। उनके सामने आपने तकरीर फ़रमाई। हज़रत अली इतने प्रभावित हुये कि तुरन्त ईमान ले आये और आपका साथ देने का वादा किया।
आम तब्लीग :- आपने खुलेआम तब्लीग करते हुये "सफ़ा" की पहाडी पर चढकर सब लोगों को इकट्ठा किया
और नसीहत फ़रमाते हुये लोगों को आखिरत की याद दिलाई और बुरे कामों से रोका। लोग आपकी तब्लीग में रोडें डालने लगे और धीरे-धीरे ज़ुल्म व सितम इन्तहा को पहुंच गये। इस पर आपने हबश की तरफ़ हिजरत करने का हुक्म दे दिया।
हिज़रत-हबश :- चुनान्चे (इसलिये) आपकी इजाज़त से नबुव्वत के पांचवे वर्ष रजब के महीने में 12 मर्द
और औरतों ने हबश की ओर हिजरत की। इस काफ़िले में आपके दामाद हज़रत उस्मान और बेटी रुकय्या भी थीं । इनके पीछे 83 मर्द और 18 औरतों ने भी हिजरत की । इनमें हज़रत अली के सगे भाई जाफ़र तय्यार भी थे जिन्होने बादशाह नजाशी के दरबार में तकरीर की थी ।
नबुव्वत के छ्ठें साल में हज़रत हम्ज़ा और इनके तीन दिन बाद हज़रत उमर इस्लाम लाये । इसके बाद से मुस्लमान काबा में जाकर नमाज़े पढने लगे।
घाटी में कैद :- मक्का वालों ने ज़ुल्म-ज़्यादती का सिलसिला और बढाते हुये बाई-काट का ऎलान कर दिया ।
यह नबुव्वत के सांतवे साल का किस्सा है । लोगों ने बात-चीत, लेन-देन बन्द कर दिया, बाज़ारों में चलने फ़िरने पर पाबंदी लगा दी ।
चचा का इन्तिकाल (देहान्त) :- नबुव्वत के दसवें वर्ष आपके सबसे बडे सहारा अबू तालिब का इन्तिकाल हो
गया । इनके इन्तिकाल से आपको बहुत सदमा पहुंचा ।
बीवी का इन्तिकाल (देहान्त) :- अबू तालिब के इन्तिकाल के ३ दिन पश्चात आपकी प्यारी बीवी हज़रत
खदीजा रजी० भी वफ़ात कर गयीं । इन दोनों साथियों के इन्तिकाल के मुशरिकों की हिम्मत और बढ गयी । सर पर कीचड और उंट की ओझडी (आंते तथा उसके पेट से निकलने वाला बाकी सब पेटा वगैरह) नमाज़ की हालत में गले में डालने लगे ।
ताइफ़ का सफ़र :- नबुव्वत के दसवें वर्ष दावत व तब्लीग के लिये ताइफ़ का सफ़र किया । जब आप वहां
तब्लीग के लिये खडें होते तो सुनने के बजाए लोग पत्थर बरसाते । आप खुन से तरबतर हो जाते । खुन बहकर जूतों में जम जाता और वज़ु के लिये पांव से जुता निकालना मुश्किल हो जाता । गालियां देते, तालियां बजाते । एक दिन तो इतना मारा कि आप बेहोश हो गये ।
मुख्तलिफ़ स्थानों पर तब्लीग :- नबुव्वत के ग्यारवें वर्ष में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रास्तों पर
जाकर खडें हो जाते और आने-जाने वालों तब्लीग (इस्लाम की दावत) करते । इसी वर्ष कबीला कन्दा, बनू अब्दुल्लाह, बनू आमिर, बनू हनीफ़ा का दौरा किया और लोगों को दीन इस्लाम की तब्लीग की । सुवैद बिन सामित और अयास बिन मआज़ इन्ही दिनों ईमान लाये ।
मेराज शरीफ़ :- नबुव्वत के 12 वें वर्ष 27 रजब को 51 वर्ष 5 माह की उम्र में आपको मेराज हुआ और पांच वक्त
की नमाज़े फ़र्ज़ हुयीं । इससे पूर्व दो नमाज़े फ़ज्र और अस्र ही की पढी जाती थी । इन्ही दिनों तुफ़ैल बिन अमर दौसी और अबू ज़र गिफ़ारी ईमान लाये ।
घाटी की पहली बैअत :- नबुव्वत के ग्यारवें वर्ष हज के मौसम में रात की तारीकी में छ: आदमियों से
मुलाकात की और अक्बा के स्थान पर इन लोगों ने इस्लाम कुबुल किया । हर्र और मिना के दर्मियान एक स्थान का नाम "अकबा" (घाटी) है । इन लोगों ने मदीना वापस जाकर लोगों को इस्लाम की दावत दी । बारहवें नबुव्वत को वहां से 12 आदमी और आये और इस्लाम कुबूल किया ।
घाटी की दुसरी बैअत :- 13 नबुव्वत को 73 मर्द और दो महिलाओं ने मक्का आकर इस्लाम कुबुल किया ।
ईमान उसी घाटी पर लाये थे । चूंकि यह दुसरा समुह था इसलिये इसको घाटी की दुसरी बैअत कहते हैं ।
हिजरत :- 27 सफ़र, 13 नबुव्वत, जुमेरात (12 सितंबर 622 ईसंवीं) के रोज़ काफ़िरों की आखों में खाक मारते
हुये घर से निकले । मक्का से पांच मील की दुरी पर "सौर" नाम के एक गार में 3 दिन ठहरे । वहां से मदीना के लिये रवान हुये । राह में उम्मे मअबद के खेमें में बकरी का दुध पिया ।
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बहुत अच्छी जानकारी शुक्रिया...!!!
जवाब देंहटाएंनबी करीम की ज़िन्दगी की सच्चाई बयान करता आलेख..........
काशिफ साहब,
जवाब देंहटाएंमुझे लगता है इसमें दो निहायत अहम् शख्सियतों के नाम छूट गए है. हज़रत अम्मार बिन यासिर और हज़रत बिलाल हब्शी. किस तरह मक्के के मुशरेकीन ने हज़रत अम्मार के माँ बाप को शहीद किया और हज़रत बिलाल पर ज़ुल्म किये, इसका तजकिरा होता तो अच्छा था.
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जवाब देंहटाएं.
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भाई काशिफ़ आरिफ,
बहुत ही अच्छा और मुझ जैसे पाठकों के लिये विश्वस्त जानकारियों से परिपूर्ण आलेख।
आभार!
bhai ye haj e asvad nhe hazar e asbad hai
जवाब देंहटाएंhazar yane pather stone
asvad yane kala black
insallha yhe theek hoga dekh lo galat ke liye mafi chahuga
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