शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

ईदुल अज़हा, बकरीद और कुरबानी के अहकाम व मसलें.. Matters & Compulsory Works Of Bakrid, Eid-Ul-Azha

इस साल ज़िलहिज़्ज़ा (इस्लामी महीने का नाम) का चांद १८ नवम्बर को दिखा है इस लिहाज़ से २८ नवम्बर को ईदुल ज़ुहा मनाई जायेगी। ईदुल ज़ुहा जिसे पुरे भारतीय उपमहाद्विप में "बकरीद" के नाम से जाना जाता है। बकरीद क्यौं मनाई जाती इसका लगभग सबको है तो इसलिये आज हम उन बातों पर गौर करेंगे जो करना ज़रुरी है लेकिन वो अकसर छुट जाती है और उन बातों पर गौर करेंगे जो बेवजह इस मुकद्द्स त्यौहार से जुड गयीं है।

तकबीरात :-  तकबीर, तहलील और तहमीद, यानि अल्लाह तआला की बडाई व बुजुर्गी ब्यान करना, उसको
                       एक मानना और उसकी तारीफ़ ब्यान करने को कहते हैं।
अश्रह ज़िलहिज़्जा में "अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर लाइलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर वलिल्लाहिल हम्द" (दार कुतनी) पढने की खास ताकीद की गई है। (मुसनद अहमद) इन तकबीरों को ज़िलहिज़्जा (बकरीद) का चांद नज़र आने के बाद से 13 जिलहिज़्जा के सूरज छुपने तक चलते-फ़िरते, उठते-बैठते और नमाज़ों के बाद पढते रहना चाहिये। (बुखारी, मिरआत शरह मिश्कात)

                          कुछ उलमा ने लिखा है की तकरीबात 9 जिलहिज़्जा की फ़ज़्र से 13 जिलहिज़्जा की नमाज़ अस्र तक पढनी चाहिये, इस बारे सहाबा किराम (रज़ि.) के तौर-तरीके हदीस की किताबों में मिलते हैं मगर बेहतर और अफ़ज़ल सूरत यही है कि ज़िलहिज़्जा का चांद नज़र आने के बाद से 13 ज़िलहिज़्जा के सूरज छुपने तक तकरीबात पढें क्यौंकि ज़्यादातर सहाबा किराम (रज़ि.) का अमल यही मिलता है और इस सूरत पर अमल करने में तमाम बातों और तरीकों पर अमल भी हो जाता है।

चादं दिखने के बाद बाल और नाखुन ना काटें: ये वो सुन्नत है जिस पर कोई अमल नही करता है, अल्लाह
                                                                           के रसुल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इससे सख्त मना फ़रमाया है। चांद दिखने के बाद बाल और नाखुन नही काटने चाहिये चाहे आप कुर्बानी कर रहे हो या नही। कुर्बानी के बाद बाल और नाखुन काटने पर हर बाल और नाखुन पर एक कुर्बानी का सवाब मिलता है।


नफ़ीली रोज़े :   अशरह जिलहिज़्जा में नफ़ील रोज़ों की भी फ़ज़ीलत साबित है। (अबू दाऊद, निसई, इब्ने
                           माज़ा) और खास तौर पर ज़िलहिज़्जा की नवीं तारीख के रोज़े का बहुत ज़्यादा सवाब है। (मुस्लिम, अबू दाऊद, निसई) जो लोग हज के लिये 9 तारीख को अरफ़ात में हों, उन्हे 9 तारीख का रोज़ा रखना मना हैं। (बुखारी, मुस्लिम)

ईदुल अज़हा के दिन :   ईदुल अज़हा (बकरीद) के दिन सुबह सवेरे गुस्ल करना बेहतर है (बयहकी) हैसियत
                                      के मुताबिक अच्छे कपडे पहनना (बुखारी व मुस्लिम) और खुश्बु लगाना सुन्नत है। (हाकिम) नमाज़ ईदुल अज़हा से पहले कुछ भी ना खाना सुन्नत है। (तिर्मिज़ी) नमाज़ खुले मैदान में अदा करनी चाहिये। (बुखारी व मुस्लिम) नमाज़ के लिये निहायत सुकून व वकार के साथ ऊंची आवाज़ से तकबीरात पढते हुए जाना चाहिये। (बयहकी) नमाज़े ईद में औरतों को भी शरीक होनी ज़रुरी है। अगर कुछ औरतें हैज़ (मासिक धर्म) आने की वजह से नमाज़ न पढ सकें तो अलग बैठ जायें और लोगों की तकबीरों के साथ दुआऐं मांगती रहें। (बुखारी व मुस्लिम) नमाज़ ईद का पसंदीदा वक्त इशराक यानि सूरज निकलने के फ़ौरन बाद का है। (अबू दाऊद) ईद की नमाज़ बगैर अज़ान व इकामत के पढनी चाहिये। (बुखारी व मुस्लिम)

तरीका नमाज़ :   नमाज़ ईद दो रकअत है। (बुखारी) पहली रकअत में तकबीर तहरीमा (अल्लाहुअकबर) के
                             बाद सात तकबीरें कहनी चाहियें और दूसरी रकअत में किरअत शुरु करने से पहले पांच तकबीरें कहनी चाहियें (तिर्मिज़ी, इब्ने माज़ा, इब्ने खुज़ैमा, दार कुतनी) बाकी नमाज़ आम नमाज़ों की तरह अदा की जाये। ईद की नमाज़ में सुन्नत यह है कि पहली रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद सूरह अअला या सूरह काफ़ पढी जाये और दुसरी रकअत में सूरह गाशिया या सूरह कमर पढी जाये। (मुस्लिम, तिर्मिज़ी)

                                कुछ लोग नमाज़ शुरु करने से पहले नमाज़ ईद की नियत करने का तरीका बताते हैं जो इस तरह होता है, "नियत करता हूं नमाज़े ईद, वास्ते अल्लाह तआला के मय ज़ायद तकबीरों के पीछे इस इमाम के, मुंह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़, अल्लाहुअकबर" नियत का यह तरीका पूरी तरह बिदअत है। दुनिया में मौजुद तमाम हदीसों की किताबों में से किसी में भी इस तरह से नमाज़ की नियत करने का तरीका नहीं मिलता है। इसलिये इस तरीके को फ़ौरन छोड देना चाहिये क्यौकि नियत तो दिल के इरादे का नाम है। (तफ़सील के लिये देखिये उम्दतुर्रेआया हाशिया शरह वकाया जिल्द 1 पेज 159) और फ़िर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का फ़रमान है कि "दीन में नई बात पैदा करना बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है और गुमराही जहन्नम का रास्ता है।" (खुतबातुल हाजा)

खुतबा :        नमाज़ के बाद तमान लोग अपनी नमाज़ की सफ़ों में बैठे रहें (बुखारी व मुस्लिम) इमाम अपनी
                      नमाज़ की जगह पर खडे होकर खुतबा दे जिसमें नसीहत और दीन की ज़रुरी बातें बताये। (बुखारी व मुस्लिम) ईदगाह से घर वापस होते हुए रास्ता बदलना सुन्नत है। (बुखारी)

कुरबानी की ताकीद:     नमाज़ ईदुल अज़हा से फ़ारिग होने के बाद कुर्बानी करनी चाहिये। कुर्बानी हर उस
                                       शख्स पर वाजिब और ज़रुरी है जो जानवर खरीदने की ताकत रखता हो। कुर्बानी करने के लिये साहिबे निसाब (साढे सात तोला सोना या साढे बावन तोला चांदी या उतने पैसे का मालिक) होने की शर्त लगाना बेदलील बात है। नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का फ़रमान है "जो शख्स कुर्बानी की ताकत रखता हो फ़िर भी ना करे वह हमारी ईदगाह के करीब भी न आयें" (इब्ने माज़ा, मुस्नद अहमद, दार कुतनी)

कुरबानी का जानवर कैसा हो? : कुर्बानी का जानवर खरीद्ते वक्त इस बात का ख्याल रखना चाहिये कि
                                                     जानवर मोटा-ताज़ा और खूबसुरत हो। (अबू दाउद, निसई, तिर्मिज़ी वगैरह) और उसके कानों, आखों और सींगों को अच्छी तरह देख लेना चाहिये। (इब्ने खुज़ैमा, हाकिम)

कुरबानी का वक्त:  कुरबानी का सही वक्त ईद की नमाज़ के बाद से शुरु हो जाता है, नमाज़ ईद से पहले की गई
                               कुर्बानी, कुर्बानी नही है। (बुखारी) कुछ लोगों ने देहात वालों को नमाज़ ईद से पहले कुर्बानी की इजाज़त दी है यह बिल्कुल गलत है, अल्लाह के दीन में दखल देना है।

कुर्बानी के दिन : सही हदीसों और सहाबा किराम के अमल की रौशनी में कुर्बानी ईद के दिन सबसे बेहतर और
                             उसके बाद तीन दिन तक दुरुस्त है यानि 13 जिलहिज़्ज़ा तक कुर्बानी की जा सकती है। (तफ़सील के लिये देखें मुसनद अहमद, दार कुतनी, सहीह इब्ने हिब्बान, बयहकी, नैलुल औतार, और तफ़सीर इब्ने कसीर)

कुर्बानी का तरीका : कुर्बानी का जानवर अपने हाथ से ज़िबह करना पसंदीदा अमल है। (मुस्लिम, अबू दाऊद)
                                 औरतों के लिये भी यही हुक्म है। (बुखारी) जानवर को ज़िबह करने से पहले छुरी खूब तेज़ कर लेनी चाहिये। (अबूदाउद, मुसनद अहमद) इस बात का ख्याल रखना भी ज़रुरी है कि छुरी जानवर के सामने या उसे लेटा कर तेज़ नही करनी चाहिये, बल्कि ये काम उसकी निगाहों से दूर रह कर करना चाहिये। (हाकिम, अल्मुअजमुल कबीर लिलतबरानी, मजमउल ज़वाइद) बकरा, बकरी, भेड, दुंबा, और भैंस को किबला की तरफ़ मुंह करके ज़िबह करने का तरीका यह है कि उसके ऊपर वाले पहलू पर अपना पांव रखकर ज़िबह करना चाहिये। (बुखारी व मुस्लिम) और ऊंट को किबला रुख खडा करके बाई टांग और रान को साथ बांधकर तीन टांगो पर खडा होने की हालत में उसके सीने और गर्दन की जड के बीच गढ्ढा नुमा जगह में भाले या कोई तेज धारदार हथियार से दुआ पढकर मारा जाये जिससे उसकी खुन की नली कट जाये, उसे "नहर" करना कहते हैं। (सुरह हज. आ. ३६, बुखारी व मुस्लिम)

कुर्बानी की दुआ :  इन्नी वज्जहतु............दुआ पढने वाली हदीस को मुहददिसीन (हदीसें जमा करने वालों)
                              ने ज़ईफ़ (कमज़ोर) कहा है। (देखें "ज़ईफ़ सुनन अबी दाऊद", "तर्जुमान" जनवरी 2004 पेज 16)

कुर्बानी का जानवर ज़िबह या नहर करते वक्त नीचे लिखी दुआ पढनी सुन्नत है।

"बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर अल्लाहुम्मा मिन्का व लका अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन्नी"

तर्जुमा :- मैं अल्लाह तआला के नाम से (ज़िबह करता हूं) अल्लाह सबसे बडा है, ऐ अल्लाह! (इसे) मेरी तरफ़ से तू कुबूल फ़र्मा। (हिस्नुल मुस्लिम)

अगर कुर्बानी अपने और अपने घरवालों की तरफ़ से है तो कहना चाहिये   :-  "बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर अल्लाहुम्मा मिन्का व लका अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन्नी व अहलेबयती"  और अगर दूसरे की तरफ़ से है तो कहना चाहिये :- "बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर अल्लाहुम्मा मिन्का व लका अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन............" के बाद उसका नाम लें और "बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर" कह कर ज़िबह या नहर करना चाहिये (बुखारी व मुस्लिम)

ज़िबह के बाद की मनघडंत दुआ : कुछ हज़रात ने लिखा है कि ज़िबह करने के बाद यह दुआ पढनी चाहिये :
                                                       "अल्लाहुम्मा तकब्बलहू मिन्नी कमा तकब्बल्ता मिन हबीबिका मुह्म्मदिऊं व खलीलिका इब्राहिमा अलैहिस्सलाम"  यह दुआ मनघंडत है। हदीस की किसी किताब में नही लिखी है। मुसलमानों को नबी की सुन्नत पर अमल करना चाहिये लोगों बनाई हुई बातों से बचना चाहिये।

(नोट : कुछ लोग कुर्बानी नहीं करते बल्कि उसकी जगह कुर्बानी की रकम गरीबों में तकसीम करना अच्छा समझते है। यह अमल बिल्कुल शरीअत के खिलाफ़ है, इससे बचना चाहिये।)

कुर्बानी की खाल :  कुर्बानी के जानवर की खालें सदका कर देनी चाहियें यानि गरीब, मोहताज, यतीमों और
                               बेवांओं को दे देनी चाहियें (बुखारी व मुस्लिम) कुर्बानी की खाल अपने इस्तेमाल में भी लाई जा सकती है। (मुस्नद अहमद) कुर्बानी की खाल बेचकर उसकी कीमत को अपने खर्च में लाना जाइज़ नही हैं। (मुस्नद अहमद) इसी तरह कुर्बानी की खाल कस्साब (कसाई या काटने वाला) को मज़दूरी के बदले देना भी जाइज़ नहीं हैं। (बुखारी व मुस्लिम) बल्कि कस्साब (कसाई या काटने वाला) को उसकी मज़दूरी अपने पास से देनी चाहिये। (बुखारी व मुस्लिम)

कुर्बानी का गोश्त :   कुर्बानी के गोश्त में से खुद खायें और दुसरों को भी खिलायें। कुरआन मजीद में सूरह हज
                                  की आयत 28 में अल्लाह तआला फ़रमाता है : "इसमें से तुम कुछ खाओ और खस्ताहाल मोहताजों को खिलाओ" और आयत 36 में अल्लाह तआला फ़रमाता है "इसमें से तुम लोग कुछ खाओ और कनाआत करने वालों (थोडे में खुश हो जाने वाले) और हाथ फ़ैलाने (मांगने) वालों को खिलाओं"। रसूलुल्लाह सल्लाल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : "खुद खाओ, रखो, और सदका करों" (बुखारी व मुस्लिम)
                                 इस बात का ख्याल रखना चाहिये कि जिन इलाकों में हैसियत वाले लोग ज़्यादा हों वहां तो जितने दिन चाहें कुर्बानी का गोश्त रखकर खायें लेकिन जहां फ़कीर, गरीब, और मौहताज वगैरा ज़्यादा हों जो कुर्बानी नहीं कर सकते हों, वहां कुर्बानी करने वालों को गोश्त जमा करने के बजाये यह कोशिश करनी चाहिये कि कुर्बानी ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे।
                                 इस्लाम के शुरुआती दिनों में नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की तरफ़ से तीन दिन से ज़्यादा कुर्बानी का गोश्त खाने या जमा करने की मनाही और बाद में खुशहाली फ़ैल जाने पर इसकी इजाज़त देने की इन दोनों सूरतों और हालतों को सामने रखा जाये तो यह किसी भी तरह ठीक नही होगा कि गरीबों और मोहताजों के घरों में तो सिर्फ़ ईद के दिन ही चार बोटिंया पकें और फ़िर फ़ाका मस्ती, मगर अमीर लोग अपनी कुर्बानी के गोश्त से फ़्रीज भर लें और महीनों खाते रहें। यह तरीका इस्लाम की आदत और नबुव्वत के मकसद के खिलाफ़ है। (सूऐ हरम पेज 427)

गरीब की ईदुल अज़हा

                                         घर में तमाम मर्द व औरतें और बच्चे उदास बैठे कुर्बानी के गोश्त का इन्तिज़ार कर रहे है....सुबह १० बज गये, फ़िर ११ भी बज गये, राह तकते हुऐ एक घंटा और गुज़र गया कि शायद कुर्बानी का गोश्त खाने को मिल जाये, और जो खुशी जानवर की कुर्बानी से जुडी हुई है उसका एहसास हो, शायद कोई गोश्त लेकर आता हो! मगर लम्बे इन्तिज़ार में भूख के सामने ज़ायका लेने की ख्वाहिश दम तोड देती है और गरीबी और मायूसी के हालात में दाल-चावल पकाने की तैयारी शुरु होती है। जिस तरह इन्तिज़ार करते करते दोपहर गुज़र जाती है उसी तरह शाम भी उम्मीद के धुंधलके में बीत जाती है और यूं ईदुल अज़हा का खुशियों भरा दिन बीत जाता है।
                                          यह कोई बनावटी कहानी नही बल्कि सच्चे हालात है जो शहर के बाहरी इलाकों और कच्ची बस्तियों के ज़्यादातर घरों में ईदुल अज़हा के दिनों में सामने आते हैं। उस दिन गरीबों की परेशानी दोगुनी युं भी हो जाती है कि बाज़ार में गोश्त नही मिलता और सब्ज़ी तरकारी वाले भी दुकान नही लगाते और शायद रंजो-गम और मायूसी की वजह से सब्ज़ी तरकारी लेने बाज़ार जाने का भी दिल नहीं करता।
                                              इधर शहरी इलाकों में हाल यह होता है कि एक खानदान में कई कई जानवर ज़िबह हो रहे हैं जिनके गोश्त उन रिश्तेदारों के यहां भी भेजे जा रहे हैं जिन्होनें खुद कुर्बानी की ह्हैं और गोश्त भरा पडा है और यह रिश्तेदार अपने साहिबे हैसियत रिश्तेदारों के यहां गोश्त पहुंचा रहे है।
     एक और रस्म है कि बेटी के ससुराल में पूरी-पूरी रानें ही नही बल्कि पूरे पूरे बकरे "ईदी" के तौर पर भेजे जा रहे हैं, भले ही बेटी की सुसराल में कई कई कुर्बानियां होती हों। यह एक ऐसी रस्म है कि जिस पर अमल करना फ़र्ज़ समझा जाता है 
 
इसके अलावा बहुत से मज़ह्बों के पेशेवर भिखारी घर घर पहुंच कर गोश्त का अच्छा खासा ज़खीरा कर लेते हैं। इससे होता यह है कि कुर्बानी के गोश्त का एक बडा हिस्सा बेकार जगहों पर इस्तेमाल हो जाता है जिसकी वजह से वह गरीब और ज़रुरतमंद महरुम रह जाते हैं जो मांगने में शर्म महसुस करते हैं। आम मुसलमानों तक गोश्त पंहुचाने की ज़हमत से यह भिखारी बचा लेते हैं और अगर कुर्बानी करने वाले को गरीबों से हमदर्दी और मुह्ब्बत का जज़्बा ना हो तो बात और तकलीफ़ देने वाली हो जाती हैं। ईदुल अज़हा में छुपा हुऐ कुर्बानी के ज़ज़्बे का मकसद तो यह है कि इसका फ़ायदा गरीबों तक पंहुचें, उनको अपनी खुशी में शामिल करने का खास इंन्तिज़ाम किया जायें, ताकि उस एक दिन तो कम से कम उनको अपने नज़र अंदाज़ किये जाने का एहसास न हो और वह कुर्बानी के गोश्त के इन्तिज़ार में दाल चावल खाने पर मजबूर न हों।

अल्लाह आप सबको कुरआन, सही हदीस और रसुल की सुन्नत पर अमल करने की तौफ़िक दे..

आमीन, सुम्मा आमीन


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10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह भई काशिफ़ मेरा नाम मौलाना तो खामखाह रख दिया गया इस उपाधि के असल हकदार तो आप हो, मुस्लिम भाईयों के लिए उचित समय पर जानकारी दी हैं आपने, अल्‍लाह आप को जन्‍नत नसीब करे, काबे की तरफ मुँह करके नमाज़ पढते रहना सबको बताते भी रहना कि हम अमरीका में होंगे तो अलग रूख से नमाज़ पढेंगे, आस्‍टेलिया में अलग तरफ होगा, बहुत से भाई यह समझते हैं हम पश्चिम की तरफ रूख करके नमाज़ पढते हैं

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  2. उमर भाई, उन लोगों को तो मैने जवाब दे ही दिया है....

    मैं कोई मौलाना नही हूं भाई और बनने का कोई इरादा भी नही है...हम तो बस जो जानकारी हमें है वो और लोगों से बाटं लेते है

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  3. इसके अलावा बहुत से मज़ह्बों के पेशेवर भिखारी घर घर पहुंच कर गोश्त का अच्छा खासा ज़खीरा कर लेते हैं। इससे होता यह है कि कुर्बानी के गोश्त का एक बडा हिस्सा बेकार जगहों पर इस्तेमाल हो जाता है जिसकी वजह से वह गरीब और ज़रुरतमंद महरुम रह जाते हैं जो मांगने में शर्म महसुस करते हैं। आम मुसलमानों तक गोश्त पंहुचाने की ज़हमत से यह भिखारी बचा लेते हैं और अगर कुर्बानी करने वाले को गरीबों से हमदर्दी और मुह्ब्बत का जज़्बा ना हो तो बात और तकलीफ़ देने वाली हो जाती हैं। ईदुल अज़हा में छुपा हुऐ कुर्बानी के ज़ज़्बे का मकसद तो यह है कि इसका फ़ायदा गरीबों तक पंहुचें, उनको अपनी खुशी में शामिल करने का खास इंन्तिज़ाम किया जायें, ताकि उस एक दिन तो कम से कम उनको अपने नज़र अंदाज़ किये जाने का एहसास न हो और वह कुर्बानी के गोश्त के इन्तिज़ार में दाल चावल खाने पर मजबूर न हों।

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  4. बहुत अच्छी जानकारी इसके लिये बहुत-बहुत शुक्रिया..! मैं काफ़ी दिनों से एक सवाल का जवाब तलाश रही थी की

    "क्या औरतें कुरबानी कर सकती है??"

    इसका जवाब आपके इस लेख पर मुझे मिल गया...

    बहुत-बहुत शुक्रिया

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  5. गिरी जी,

    मुझे आपकी अक्ल पर हंसी आ रही है और तरस भी आ रहा है.......अब ये सोच रहा हूं की पहले तरस खांऊ या पहले हंसु....

    जनाबे मैनें भिखारियों की बात की है मेहमानों की नही.......

    आपने कभी देखा है की किसी गैर-मुस्लिम मेहमान को कभी कच्चा गोश्त दिया गया है....कि घर जाकर पका लेना.....गैर-मुस्लिम को क्या कभी किसी मुस्लिम मेहमान को भी कच्चा गोश्त नही दिया जाता है.......


    मैंने उन लोगों का ज़िक्र किया है जो घर-घर जाकर मांगते है और गोश्त जमा कर लेते है....

    जनाब विवाद भी दिमाग से पैदा किये जाते है...जिनके पिछे वाजिब वजह होनी चाहिये....

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  6. अस्सलाम अल्लैकुम, आप का ब्लॉग देखा बहुत खूब! भाई आप ने अपनी जो तस्वीर लगा राखी है.आपका ब्लॉग में कोई तवाजुन नहीं है! ऐसा क्यों?????आपके ब्लॉग का लिंक अपने यहाँ दे रहा हूँ.
    अल्लाह हाफिज़

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  7. bhai kashif aapne bakrid ke jo jaruri ahkam bataye hai wo to thik hai par bakrid teen din ki hoti hai 10 jilhjja se 12 jilhijja tak 13 ko nah

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  8. मैंने तो पढ़ा है कि कुर्बानी का अर्थ त्याग और दान से है, न कि किसी जानवर को काटने से। जो मैंने पढ़ा है, क्या वो गलत है? गलत है या सही, कृपया रौशनी डालें।

    ms.aamin@gmail.com
    mydunali.blogspot.com

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  9. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif साहब, बकरीद पर कुछ बात करने के लिए साइट पर आपका फोन नंबर तलाश रहा था. नहीं मिला.
    ranjan.rajn@gmail.com

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आपको लेख कैसा लगा:- जानकारी पूरी थी या अधुरी?? पढकर अच्छा लगा या मन आहत हो गया?? आपकी टिप्पणी का इन्तिज़ार है....इससे आपके विचार दुसरों तक पहुंचते है तथा मेरा हौसला बढता है....

अगर दिल में कोई सवाल है तो पुछ लीजिये....

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