बुधवार, 11 नवंबर 2009

एक भी भारतीय मुस्लमान देशभक्त नही है..!! No Indian Muslim Is Patriostic..!!!


पिछ्ले कुछ दिनों से जब से जमाते इस्लामी ने "वन्दे मातरम" के फ़तवे के मसले पर अपनी राय रखी है तब से पुरे देश में बवाल मचा हुआ कोई मुसलमानों को गाली दे रहा है,  कोई चेतावनी दे रहा है की हम काटने को बैठे है,             

कोई इस्लाम के "सच्चे" फ़ालोवर्स से परिचय करा रहा है,        कोई मुसलमानों को बता रहा है की उन्हे "वन्दे मातरम" गाना चाहिये, कोई गद्दार कह रहा है, कोई हमें देश से बाहर निकालने को तैयार बैठा है।

वन्दे मातरम का अर्थ क्या है?? वो मुह्म्मद उमर कैरानवी बता चुके है..!!!

इसलिये सीधे मुद्दे की बात करते है...

जो लोग इस फ़तवे पर इतना बवाल मचा रहे है उन सब लोगों से मैं सवाल करना चाहता हूं   "क्या वन्देमातरम गाना देशप्रेम का सर्टिफ़िकेट है?"  "क्या वन्देमातरम को ना गाने वाला देशद्रोही है?" "अगर कोई मुस्लमान फ़ौजी "वन्देमातरम" नही गायेगा तो क्या वो भी देशद्रोही कहलायेगा?"



जो लोग वन्दे मातरम को लेकर इतना शोर कर रहे है उनमें से किसको "वन्दे मातरम" मुंह ज़बानी याद है??? किसको उसका अर्थ याद है??? भारत के किस शख्स ने "वन्दे मातरम" के अर्थ को अपनी ज़िन्दगी मे उतारा है??? "वन्देमातरम" हो, "जन गण मन" हो, या "सारे जहां से अच्छा" कौन इनके ऊपर अमल कर रहा है??? सबको बस हराम का पैसा चाहिये एक छोटा सा डाकिया भी कोई ज़रुरी कागज़ देने के लिये बीस से तीस रुपये मांगता है और जब भी कोई बेवकुफ़ उलेमा कोई फ़तवा देता है तो यही लोग देशभक्त और देशप्रेमी बनकर खडे हो जाते है गाली देने के लिये!

कहां चला जाता है तुम्हारा देशप्रेम? कहां चली जाती है देशभक्ति? इसी देश के लोगों का खुन चुसते है तब याद नही है की "अपनी मां के बेटों का खुन चुस रहे हो?" तब कहां जाती है तुम्हारी (कथित) मातर्भक्ति???? 


मैं एक भारतीय मुसलमान हूं और मुझे अपने भारतीय होने पर फ़ख्र है..! मैं मुल्क से प्यार करता हुं और उसके लिये जान दे सकता हूं और ले भी सकता हुं और मुझे इस जज़्बे को साबित करने के लिये किसी से सर्टिफ़िकेट नही चाहिये।


मां-बाप की मर्ज़ी के बगैर अपनी ज़िद से इंगलिश मिडियम की पढाई छोडी सिर्फ़ एन.सी.सी. जाइन करने के लिये..!! 5 साल एन.सी.सी की, ए ग्रेड से सी सर्टिफ़िकेट पास किया, शुटिंग में गोल्ड मेडल, तीन साल तक पुरी २यु.पी. बटालियन के कैडेट्स को लीड किया,...सिर्फ़ अपने देश की सेवा करने के लिये...

एन.डी.ए. के सारे इम्तिहान बहुत अच्छे से पास किये....लेकिन मेडीकल में उन्होने बाहर कर दिया वो भी पन्द्रह साल की उम्र में "लिगामेंन्ट" में लगी एक चोट की वजह से......

अब मेरा छोटा भाई एन.डी.ए. की तैयारी कर रहा है.... अब भी कोई मुझे "गद्दार" कहेगा???

मैं और मेरे जैसे भारतीय मुसलमान अपने देश से प्रेम करते है "हम देशप्रेमी है देशभक्त नही" हम अपने देश से प्यार करते है और हमेशा करते रहेंगे लेकिन हम उसकी इबादत नही कर सकते है...

अल्लाह के रसुल सल्लाहो अलैह वसल्लम ने मां के पैरों में जन्नत, और बाप को जन्नत का चौकीदार कहा है... और ये भी कहा है की अल्लाह के बाद अगर किसी को सज्दा जाइज़ होता तो वो मां-बाप को होता लेकिन उनके पैर छुने की भी इजाज़त नही है...अगर मां-बाप तुम्हारे साथ जुल्म करें तुम्हे मारें-पिटे तब भी तुम उफ़्फ़ मत करों, उनको इज़्ज़त दो और उनकी फ़रमाबरदारी करो.... मां-बाप का हुक्म तुम्हारे लिये सब-कुछ है लेकिन अगर वो अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत करने को कहें तो उस हुक्म को मत मानों लेकिन तब भी उनके साथ अच्छा सुलुक करों..... ये है मां-बाप का ओहदा इस्लाम में........लेकिन इबादत उनकी भी नही है..

अल्लाह के अलावा कोई पुज्य नही है......यही इस्लाम का मूल मन्त्र है...।

इबादत और मौहब्बत में बहुत मामुली सा फ़र्क है.........मौहब्बत अगर हद से बढ जाये तो इबादत बन जाती है और इबादत भी एक मौहब्बत है क्यौंकि जब तक बन्दा अपने खुदा से, अपने भगवान से मुहब्बत नही करेगा वो इबादत नही कर सकता।

ये हमारे देश के उलेमा राजनेताओं के हाथ की कठपुतली है...ये हमेशा उस बात पर फ़तवा देते है जिस पर विवाद पैदा हो और दुसरों को बोलने का मौका मिलें..!!! सिर्फ़ उनके कहने से क्या मुसलमान "वन्दे मातरम" गाना बन्द कर देंगे??? आज भी बहुत से मुसलमान इस गाते है मैंने भी इसे बहुत गाया है...।  ये उन मसलों को भुल चुके है जिन्हे फ़तवों की ज़रुरत है..    जिनका ज़िक्र फ़िरदौस जी कर रही है। ये सब राजनेताओं की साजिश है गरीबों को भुलाने की "आटे का क्या दाम है??"  सिर्फ़ हमारा ध्यान हटाने का मंहगाई से

तो मेरी सारे हिन्दुस्तानियों से गुज़ारिश है कि "वन्दे मातरम" को गाने से कोई देशप्रेमी नही हो जाता है और ना ही उसको ना गाने वाला गद्दार है। इसलिये ये सब शोर-शराबा बन्द कीजिये और अपनी ताकत को ज़ाया मत कीजिये...ये राजनेता विवाद पैदा करते है एक बात से ध्यान हटाकर दुसरी तरफ़ लगाने के लिये ये "वन्दे मातरम" और मराठी विवाद पैदा किया गया है सिर्फ़ मंहगाई से ध्यान हटाने के लिये

तो बराय मेहरबानी सिर्फ़ नेताओं के बनाये हुये विवादों पर ना लडें....और अपना ध्यान अपने देश को सुधारने में लगायें...!!!


अगर लेख पसंद आया हो तो इस ब्लोग का अनुसरण कीजिये!!!!!!!!!!!!!


"इस्लाम और कुरआन"... के नये लेख अपने ई-मेल बाक्स में मुफ़्त मंगाए...!!!!

29 टिप्‍पणियां:

  1. कासिफ जी आपका पूरा लेख पढ़ा , आपने बहुत ही अच्छा लिखा है उसके लिए आप बधाई स्वीकार करें। आपके बातो से कुछ हद तक सहमत हूँ। सबको पता है जब आजादी की लड़ाई लड़ी गयी तब हिन्दू और मुसलमान मिल कर लड़े थे आजादी के लिए और साथ में गाया था "वन्दे मातरम" । इस समय माहौल मुसलमानो के पक्ष में नहीं है भारत में, और बात स्वीकार करनी पड़ेगी । ऐसे समय में इस तरह के हफवाह फैलाने का क्या मतलब होता है । आखिर क्यों जब भारत और पाकिस्तान का क्रिकेट मैच हो रहा होता है तो बहुत से मुसलमान पाकिस्तान की जयकार लगाते है ? और हाँ मैंने अपने आँखो से देखा है। आखिर क्यों आजमगण में पकड़े गये आंतकवादी भारतीय मुसलमान थे ? क्यों कोई जवाब हो तो बताईयेगा। कासिफ जी ऐसा नहीं है कि मैं आपके लेख से असहमत हूँ, लेकिन इस प्रकार की घटनाओ के पिछे जीन घटनाओं का उल्लेख मैंने किया है, ये आग में घी डालने का काम करतीं है और शायद आप भी इस बात से वाकिफ होंगे। सहमत हूँ आपसे कि वन्दे मातरम न गाने से कोई देशद्रोही नहीं बन जाता लेकिन कासिफ जी जरा ध्यांन दीजिएगा इनका विरोध उन लोगो के द्वारा किया जा रहा है जिन्हे आप लोगो नें चुना है, और घर का मुखिया जो कहता है उसे सभी अपनाते है, और जब भी घर का मुखिया कोई भी गलत काम करता है तो उसके जिम्मेदार कहीं ना कहीं परिवार वाले भी होते है, बस यही बात है जो यहाँ चल रही है। और मुझे नहीं लगता कि राष्ट्र गान को गाने में किसी को किसी भी प्रकार की दिक्कत होनी चाहिए वे भी धर्म को जिम्मेदार मानकर। और इसे ये कहकर गाने से मना कर देना कि ये धर्म विरोधी है ये बात जरा समझ नही आती । आप इससे जुडा मेरा लेख पढ़े शायद आपको कुछ और जानने को मिले।

    http://mithileshdubey.blogspot.com/2009/11/blog-post_05.html

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  2. झूठ है की हर भारतीय मुसलमान देशभक्त नहीं है पर सच है की वंदेमातरम गाने से आपत्ति करने वाले मुसलमान के लिए राष्ट्र सर्वोपरि नहीं है !

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  3. आपने बहुत अच्छे तरीके से अपनी बात रखने की कोशिश
    की है ,कृपया ये बताएं क्या मुस्लिम लोग महबूब की
    वंदना करने वाली गज़लें लिखते या पढ़ते नहीं हैं ?
    फिर मात्रभूमि की वंदना पर एतराज़ क्यों ?मुस्लिम नवाबों
    और बादशाहों को सजदा ( झुक कर सलाम ) नहीं किया
    जाता था ? क्या उनके शान में कशीदे नहीं पढ़े जाते थे ?
    वन्दे मातरम गैर इस्लामी कैसे हुआ ?

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  4. वाह भाई आपने हमारी बात, बहुत अच्‍छे अंदाज से रखी, बहुत व्‍यस्‍त था इस लिये कंधे से कंधा मिला के आवाज को और बुलंद ना कर सका, अच्‍छी पोस्‍ट पर बधाई

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  5. वन्‍दना करो उसकी जिसने सारी सृष्टि बनाई अर्थात कहो 'वन्‍दे ईश्‍वरम'
    देखें हमारा ब्लाग

    वन्‍दे माततरम के बारे में अधिक जानने के लिये देखे
    ‘वन्दे मातरम्’ का पाठ अनुवाद, इसकी हकीक़त, & article: नफ़रत की आग बुझाइएः -डा. अनवर जमाल vande-matram-islamic-answer
    http://hamarianjuman.blogspot.com/2009/11/vande-matram-islamic-answer.html

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  6. एक भी भारतीय मुसलमान देश भक्‍त नहीं है यह कैसे कह सकते हैं, ए. आर. रहमान ने वन्‍दे मातरम पर बहुत महनत कर रखी है कमसे कम उसे तो हम मान लेंगें कि देश भक्‍त है,

    अवधिया चाचा
    जो कभी अवध ना गया

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  7. yaa baat scha ha. ke logo ka dayan baatny ka leey mrhate ,hinde,bandaymatram ka muda utay ja rha ha. har logo ko bdatee mhgaee shy dayan batnay ka ley sab darama key ja rha ha. par logo ko kab samj aay ge en natao ke khal? aap na ach preyas key ha ......

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  8. आपने बहुत अच्‍छा लिखा बधाई, आपकी पोस्‍ट से मैं भारत की 15 भाषाओं (जो हर नोट पर लिखी होती हैं, और मेरी नजर में उनमें भाई बहिन का रिशता है) में से एक उर्दू के लिये आवाज उठाना चाहता हूं, जैसा कि आप जानते हैं ब्लागवाणी मुझे अर्थात साइबर मौलाना मुहम्‍मद उमर कैरानवी को अपनी मेम्‍बरशिप नहीं देता अब वह हमारी भारतीय भाषा के भी विरूद्ध हो गया है,यह अपने लेबल बाक्‍स में इस भारतीय भाषा को गलत इमले से दे रहा है
    देंखें ब्लागवाणी के बाक्‍स में 'उर्दू कविता' किया लिखा है,
    ऐसे लिखा है, ''ऊदू कविता'' I have screen shot

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  9. bhai jaan ur artical is nice and worthwhile, but there is some point where i m not agree with u.above one person rightly gave his comment that why did people even mulla maulana offer sajada before mugal emporer.why do muslim poet offer same place his/ her mehboob as rab , khuda.
    Brother we never say that all muslims are terrorist but mostly. why am i using this word mostly do u wanna know? let me tell u i have got a large no of muslim friends we usualy discuss on issue related to indo pak relation kashmir and others but every time they support pakistan's stretagy they feel happy when pakistan wins match.they usualy say india is our maternal grandmom home pakistan is our home. why?
    we dont forget janab Ashfaq ullah khan's shahadat, Abdul hamid sahab's shahadat but why only few names as compare to hindu & sikh soldirs.
    one reseon of this is illitrecy but ur own people like saleem ,kairanavi r responsible for it. they want islamic education shariyat law now saleem is talking about islamic banking. ur own people want to put ur own people backwar d.its not any hindu.

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  10. आपने बहुत अच्छे तरीके से अपनी बात रखने की कोशिश
    की है ,कृपया ये बताएं क्या मुस्लिम लोग महबूब की
    वंदना करने वाली गज़लें लिखते या पढ़ते नहीं हैं ?
    फिर मात्रभूमि की वंदना पर एतराज़ क्यों ?मुस्लिम नवाबों
    और बादशाहों को सजदा ( झुक कर सलाम ) नहीं किया
    जाता था ? क्या उनके शान में कशीदे नहीं पढ़े जाते थे ?
    वन्दे मातरम गैर इस्लामी कैसे हुआ ?


    कोई सुधि लेखक है जो अजय जी के इन प्रश्नों का सही सही उत्तर दे सके ?

    कैरान्वी के तो बूते से बहुत दूर की बात है ,उनको सिर्फ लफ्फाजी करते पाया जाता है !!!!

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  11. इन ६० साल में मुस्लमानो को सिर्फ़ वोट से ज्यादा कुछ समझा ही नही गया . और इसके जिम्मेदार खुद मुसलमान है क्यो की उन्होने अपना मुसतकविल सौदागरो के हाथ मे दे दिया . और उन सौदागरो ने उन्हे सामान समझा और इज़्ज़त नही दी . जब अपने ही ऎसा करेंगे तो बाहर वाले तो बतमीजी करेंगे

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  12. हम तो हैं देशभक्त, शायद अपवाद।
    कैरानवी साहब आपने भी तो अपने लंबे चौड़े लेख में "शुभ्र" को शुभ लिखा है। हा हा!

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  13. @ बवाल ji जी आपको बवाल कहते केवल मुझे झिझक होती है, दुनिया जानती है, सारी उपाधियाँ कैरानवी के लिए हें.. बात समझा नहीं काशिफ सहब समझे हों तो इस नासमझ की रहनूमाई करें
    एक जवाब कहीं और का भी हे आपने पूछा था कभी, इस्लामी निशान किया है? तो उसका जवाब हे मोहम्मद स. जो मोहर अपने खत पर लगाते थे वो हे इस्लामी निशान, तफ़सील फिर कभी

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  14. .
    .
    .
    काशिफ आरिफ जी,
    वंदे मातरम गाना या न गाना कोई मुद्दा नहीं है।
    अपनी अल्पबुद्धि से जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ बहुत जगह विवाद इसलिये हो रहा है क्योंकि कुछ मुस्लिम यह इम्प्रेशन दे रहे हैं..." हमारे लिये सब से बढ़कर मजहब है। "
    जबकि अधिकांश मानवता मानती है..." सब से बढ़कर देश...इस बार और हर बार... हरदम और हमेशा ! "

    उत्तर देंहटाएं
  15. @ मिथलेश जी, आप मेरे ब्लोग पर आये उसका बहुत-बहुत शुक्रिया।

    पहली बात मेरा नाम "काशिफ़" है...... "कासिफ़" नही।

    दुसरी बात ये उलेमा जो फ़तवा ज़ारी करते है उनको चुनने में हमारा कोई हाथ नही होता है.....ना ही आम मुस्लमानों से कुछ पुछा जाता है या उनकी कोई राय ली जाती है......दारुल उलुम हो या जमीयत-ए-हिंद या कोई और संस्था...संस्था के सदर के औहदे के लिये उम्मीदवार संस्था के मेम्बर खडे होते है और यही लोग अपने सदर कि चुनते है इसमें आम मुस्लमान का कोई हाथ नही होता है...

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    उत्तर
    1. Tum hi chunte ho
      Sab atankwadi Hain
      Kabhi deshbhakt Ni ho Sakte
      Sharm aati h tum logon par

      हटाएं
  16. @ AJAI जी, और रोहित जी,

    आप लोग मेरे ब्लोग पर आये और अपने विचार रखें उसका बहुत-बहुत शुक्रिया..! अब आगे आप लोगों के सवाल का जवाब...

    "इस्लाम में शायर की बख्शिश नही है"...

    उसको किसी कीमत पर माफ़ी नही मिलेगी......क्यौंकीं वो अपने गाने और गज़ल को बनाने के लिये कुछ याद नही रखते....एक इंसान को भी खुदा बना देते हैं.....आगे अल्लाह बहुत रहमत वाला क्या पता किसका गुनाह किस नेक आदत या काम के बदले माफ़ कर दें...!!!!!

    मैं ना इस तरह के गाने गाता हूं और अगर कोई गा रहा होता है तो उसको रोकता हूं....

    रही बात बादशाहों को सज्दा करने और उनके कसीदे पढने की... ये बात तो मैं अपने लेख मे ही साफ़ कर चुका हूं सज्दा सिर्फ़ अल्लाह को है....

    अरें..!!! जब मां को सज्दा करने की इजाज़त नही है जिसके बारे में कहा गया है कि "तुम सारी उम्र उस धक्के या झटके के दर्द का हिसाब नही चुका सकते जो तुम्हारी मां ने उस वक्त खाया था जब तुम उसके पेट में थे"

    तो ये बादशाह क्या चीज़ है??? जो ऐसा करते थे और जो करवाते थे उनसे अल्लाह हिसाब करेगा...और दुनिया में बहुत से ऐसे बादशाह हुये है जिन्होने अपने आप को खुदा कहा है और अपने आप को सज्दा कराया है....उनमें से कुछ का ज़िक्र कुरआन में जैसे फ़िरऔन और नमरुद...!! उनका क्या हर्श हुआ ये तो दुनिया को मालुम है....फ़िरऔन के बारे में कुरआन में कहा गया था कि उसकी लाश को ज़मीन ने उगल दिया...आसमान ने वापस फ़ेंक दिया...फ़िर अल्लाह के हुक्म से वो समुंद्र में रही लेकिन ये हुक्म था की वो ना गलेगी, ना सडेगी, और ना उसे मछलियां खायेंगी...!!!

    "उस लाश को आप लोग मिस्र के अजायबघर में देख सकते है...१८००-२००० साल बाद भी वो सलामत है....ये सबक है दुनिया के लिये सिवाय अल्लाह के सज्दा किसी को नही किया जा सकता, किसी को पुजा नही जा सकता

    उत्तर देंहटाएं
  17. @ उम्दा सोच,

    ये ऊपर वाली टिप्पणी आपके सवाल का जवाब है...

    उत्तर देंहटाएं
  18. शायरों और बादशाहों को अल्लाह के रहमोकरम
    पर छोड़ दिया गया , चाहे तो सजा दे चाहे तो बख्श
    दे | तो फिर वन्देमातरम गाने वालों को भी छोड़
    देना चाहिए अल्लाह इन्साफ करेगा , फतवा क्यों ?

    उत्तर देंहटाएं
  19. काशिफ साहब ने बहुत बेहतर आलेख लिखा,इसके लिए उनको तहेदिल से शुक्रिया।
    इस आलेख पर आई कई टिप्पणियों को देखकर लगता है कि अक्सर लोग आज के मुसलमान और इस्लाम को एक ही समझ बैठे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि मुसलमान का हर अमल इस्लाम नहीं है बल्कि इस्लाम तो नाम है कुरआन की शिक्षा और मुहम्मद सल्ल की अमली जिन्दगी का।
    सच्चाई यह है कि आज ज्यादातर मुसलमानों की जिंदगी में इस्लामी शिक्षाएं नहीं पाई जाती और इनके इस अमल को देखकर इस्लाम पर कई तरह की तोहमत लगाई जाती है मसलन मुसलमान गजलों में महबूब की इबादत का जिक्र क्यों करते हैं? बादशाहों के आगे सिर क्यों झुकाते थे? ज्यादातर आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होते हैं? आदि-आदि। सच्चाई यह है कि यह इस्लाम नहीं है।
    इस्लाम पर आरोप लगाने से पहले कम से कम उस मामले में कुरआन का नजरिया और मुहम्मद सल्ल का अमल देख लेना पर्याप्त है। हालांकि मेरा यह भी मानना है कि गैर इस्लामी अमल कर इस्लाम के बारे में गलतफहमियां पैदा करने के लिए खुद मुस्लिम भी जिम्मेदार हैं लेकिन उम्मीद बाकी भाइयों से भी की जाती है कि इस्लाम के बारे में राय मुसलमानों के अमल को देखकर नहीं बल्कि कुरआन और मुहम्मद साहब के अमल को देखकर बनाई जाए।

    उत्तर देंहटाएं
  20. उम्दा सोच उर्फ़ सौरभ चट्र्जी जी,

    ये नज़रिया आपका हो सकता है हमारा नही...ये कोई सर्टिफ़िकेट नही है कि ये इम्तिहान पास करना ज़रुरी है.... देशप्रेम मुसीबत के वक्त पता चलता है जब देश के लिये दान देना होता है तब पता लगता है...हमेशा से मुस्लमान इस काम में आगे रहा है....अरे हमारे दान देकर दिखावा करना भी मना है...दान भी ऐसे दो दायें हाथ से दो तो बायें हाथ को भी पता ना लगें ये तरीका है इस्लाम में दान देने का...!!!!!

    देश का इतिहास उठाकर देखिये....घोटाला करने वालों में उन लोगों का नाम आपको मिलेगा जो सबसे ज़्यादा ज़ोर से "वन्दे मातरम" चिल्लाते है और देशभक्ति की बातें करते है..।
    सबसे क्म मुस्लमानों का नाम होगा इस लिस्ट में.... इस्लाम में ज़कात देना हर मुस्लमान का फ़र्ज़ है और ज़कात गरीब को दी जाती है....ज़्यादा जानने के लिये मेरा ये लेख पढे..!!!

    http://qur-aninhindi.blogspot.com/2009/09/who-deserve-your-zakaat.html

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  21. वेबदुनिया जी,

    आपकी बात सही है...जिसको देखो इस्लाम को गाली दे रहा है जबकि गलती मुसलमानों की है जिन्होने इस्लाम को अपनी ज़िन्दगी में सही तरीके से नही उतारा है.....

    उत्तर देंहटाएं
  22. धीरु सिंह जी,

    आपने सही कहा है पिछ्ले साठ सालों में लोगों ने मुस्लमानों को सिर्फ़ इस्तेमाल ही किया है अपने-अपने तरीके से...

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  23. kashif ji sayad aap darul-islam ka matalab samjhte ho....aur sayad maine uchcharan sahi kiya hai.....kya quran me yah nahi likha ki tab tak jehad karo jab tak pure dharti par islam kayam naa ho jaye......agar ye baat sahi hai to mai aapse ye puchhana chahunga ki agar koi muslim country hamare desh par aakraman karti hai to sachha musalman kiska saath dega?....sayad musalmano ka....aur agar usane apne desh ka saath diya to wah sachha muslamaan nahi hai kyun usane quran ko nahi maana....kripya ho sake to mere confusion dur karne ka kasht karen?

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  24. वन्दे मातरम न हिंदुओं का है न किसी व्यक्ति विशेष का....फिर आप का और आप जैसे कयी अन्य मुस्लमानों का इस पर विरोध क्यों...
    हमने अब्दुल कलाम का विरोध नहीं किया...
    रहीम जी के भजनों को पूजा में गाया है...
    रसखान की कुंडलियों को सुबह उठकर पढ़ा है...
    राही मासूम जी द्वारा लिखे गये महाभारत के वाक्यों को घर-घर में सुना जाता है...
    रफी जी के गीत सब की जुवान पर है...

    अल्लाह रखा तथा अन्य कयी संगीतकारों को बहुत संमान दिया है...
    जो अच्छे कार्य कर रहे हैं वे चाहे हिंदु हो या मुस्लमान, संमान मिलता है...
    वन्दे मातरम हमारी पहचान है...राष्ट् गीत है...आज से नहीं कयी वर्षों से है...इसे गाने से आप के इस्लाम का मान नहीं घटेगा...

    अल्लाह या ईश्वर को हमने नहीं देखा है...
    फिर भी हम उसकी इबादत करते हैं...
    ये हमारी और आप की केवल आस्था है...
    जिस देश में हम रह रहे हैं वो हमारी मात्रि भूमि है... अगर हम उसकी इबादत करें तो कौन सा पाप होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  25. सच तो ये भी है हिंदुस्तान के मुसलामन वे कमजोर हिन्दू है जो गद्दार थे जो मोत के डर से मुस्लिम बनगये या फिर अरबियो की नाजायज ओलाद है हिंदुस्तान और पाकिस्तान में एक भी असली मुस्लिम है ही नही और पूरा अरब इनको गन्दी नजरो से देखता है और इतिहास को अक्रान्ताओ ने अपने हिसाब से लिखवाया और बावजूद इसके हिंदुस्तान और पाकिस्तान का कोई भी मुस्लिम अपने आप को मुसलमनो का असली खून मानता है तो वो अपने आप को और ओरो को बेवकूफ बना रहा है और बहौत बड़ी गफलत में जी रहा है .............................................आजम खान

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  26. Agar islam takat ki bunyad per bharat me hota toh bharat me hindu naam ka koi shakhs hota hi nh... Islam aya hai bharat me toh.. Islamic ideal se unki fitrat se... logo ne Islam ko sach jana hai qki wo sacha mazhab hai yaha muddah kisi ki peedhi ko gali dene ka nh qki hindu logo me adhikter humne ye hi paya h.. tumme hai hi kya sharab peena aash kerna bhang peena aurat ki izzat na kerna... koi sacha musalman ager ek aam muslim h wo janta h ki use kaise jeena h or uska ideal use sahi chala raha h ki nh tumhare dharm ke mutabik jeene wala koi koi bulandi per baitha baba bh apní awas per kaabu nh karta or log uski fitrat nh jaan skte... comparison bh mat krna

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