गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

साहिबे-कुरआन मुह्म्मदुर्रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मुहम्मद साहब का संक्षिप्त जीवन परिचय भाग-1... Short Life Story Of Allah's Messanger Mohammad

          ल्लाह ने अपने आखिरी नबी, मुह्म्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर अपना आखिरी पैगाम कुरआन शरीफ़ नाज़िल किया था। कुरआन शरीफ़ जो सारी इन्सानियत के लिये नाज़िल हुआ है, जो रहम और बरकत की किताब है। अगर आपको एक मुस्लमान की ज़िन्दगी क्या होती है देखनी है तो आप नबी करीम मुह्म्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी से अच्छी मिसाल दुनिया में कोई नही है।

आज हम उनके जीवन का एक संक्षिप्त परिचय पढेंगे.....

हसब-नसब (वंश) {पिता की तरफ़ से} :-  मुह्म्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बिन (1)
                                                                  अब्दुल्लाह बिन (2)  अब्दुल मुत्तलिब बिन  (3)  हाशम बिन  (4) अब्दे मुनाफ़ बिन (5)  कुसय्य बिन  (6)  किलाब बिन  (7)  मुर्रा बिन  (8) क-अब बिन (9)  लुवय्य बिन (10) गालिब बिन (11) फ़हर बिन (12) मालिक बिन (13)  नज़्र बिन (14)  कनाना बिन (15)  खुज़ैमा बिन (16)  मुदरिका बिन (17)  इलयास बिन (18)  मु-ज़र बिन (19)  नज़ार बिन (20)  मअद बिन (21)  अदनान........................(51) शीस बिन (52)  आदम अलैहिस्सल्लाम।  { यहां "बिन" का मतलब "सुपुत्र" या "Son Of" से है }

              
              अदनान से आगे के शजरा (हिस्से) में बडा इख्तिलाफ़ (मतभेद) हैं। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने आपको "अदनान" ही तक मन्सूब फ़रमाते थे।

हसब-नसब (वंश) {मां की तरफ़ से} :-  मुह्म्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बिन (1) आमिना
                                                              बिन्त (2)  वहब बिन (3) हाशिम बिन (4) अब्दे मुनाफ़.....................। आपकी वालिदा का नसब नामा तीसरी पुश्त पर आपके वालिद के नसब नामा से मिल जाता है।

बुज़ुर्गों के कुछ नाम :-  वालिद (पिता) का नाम अब्दुल्लाह और वालिदा (मां) आमिना। चाचा का नाम अबू
                                    तालिब और चची का हाला। दादा का नाम अब्दुल मुत्तलिब, दादी का फ़ातिमा। नाना का नाम वहब, और नानी का बर्रा। परदादा का नाम हाशिम और परदादी का नाम सलमा।

पैदाइश :-    आप सल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैदाइश नौ रबीउल अव्वल एक आमुल फ़ील (अब्रहा के 
                    खान-ए-काबा पर आक्रमण के एक वर्ष बाद) 22 अप्रैल 571  ईसवीं, पीर (सोमवार) को बहार के मौसम में सुबह सादिक (Dawn) के बाद और सूरज निकलने से पहले (Before Sunrise)  हुय़ी। (साहित्य की किताबों में पैदाइश की तिथि 12 रबीउल अव्वल लिखी है वह बिल्कुल गलत है, दुनिया भर में यही मशहूर है लेकिन उस तारीख के गलत होने में तनिक भर संदेह नही)

मुबारक नाम :-   आपके दादा अब्दुल मुत्तालिब पैदाइश ही के दिन आपको खान-ए-काबा ले गये और तवाफ़
                            करा कर बडी दुआऐं मांगी। सातंवे दिन ऊंट की कुर्बानी कर के कुरैश वालों की दावत की और "मुह्म्मद" नाम रखा। आपकी वालिदा ने सपने में फ़रिश्ते के बताने के मुताबिक "अहमद" नाम रखा। हर शख्स का अस्ली नाम एक ही होता है, लेकिन यह आपकी खासियत है कि आपके दो अस्ली नाम हैं। "मुह्म्मद" नाम का सूर: फ़तह पारा: 26 की आखिरी आयत में ज़िक्र है और "अहमद" का ज़िक्र सूर: सफ़्फ़ पारा: 28  आयत न० 6 में है। सुबहानल्लाह क्या खूबी है।

दूध पीने का ज़माना :-  सीरत की किताबों में लिखा है कि आपने 8  महिलाओं का दूध पिया। (1) अपनी
                                      वालिदा आमिना (2) अबू लहब की नौकरानी सुवैबा (3) खौला (4) सादिया (5) आतिका (6) आतिका (7)  आतिका (इन तीनों का एक ही नाम था) (8)  दाई हलीमा सादिया । वालिदा मे लगभग एक सप्ताह और इतने ही समय सुवैबा ने दूध पिलाया । इसके बाद दाई हलीमा सादिया की गोद में चले गये । और बाकी 5 दूध पिलाने वालियों के बारे में तफ़्सील मालूम न हो सकी ।

पालन--पोषण :-   लग-भग एक माह की आयु में पालन-पोषण के लिये दाई हलीमा की देख-रेख में सौंप दिये
                             गये । आप चार-पांच वर्ष तक उन्ही के पास रहे । दर्मियान में जब भी मज़दूरी लेने आती थी तो साथ में आपको भी लाती थीं और मां को दिखा-सुना कर वापस ले जाती थी।

वालिद (पिता) का देहान्त :- जनाब अब्दुल्लाह निकाह के मुल्क शाम तिजारत (कारोबार) के लिये चले गये
                                              वहां से वापसी में खजूरों का सौदा करने के लिये मदीना शरीफ़ में अपनी दादी सल्मा के खानदान में ठहर गये। और वही बीमार हो कर एक माह के बाद 26  वर्ष की उम्र में इन्तिकाल (देहान्त) कर गये। और मदीना ही में दफ़न किये गये । बहुत खुबसुरत जवान थे। जितने खूबसूरत थे उतने ही अच्छी सीरत भी थी। "फ़ातिमा" नाम की एक महिला आप पर आशिक हो गयी और वह इतनी प्रेम दीवानी हो गयी कि खुद ही 100  ऊंट दे कर अपनी तरफ़ मायल (आशिक या संभोग) करना चाहा, लेकिन इन्हों ने यह कह कर ठुकरा दिया कि "हराम कारी करने से मर जाना बेहतर है"। जब वालिद का इन्तिकाल हुआ तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मां के पेट में ही थे।

वालिदा (मां) का देहान्त :-   वालिदा के इन्तिकाल की कहानी बडी अजीब है। जब अपने शौहर की जुदाई का
                                             गम सवार हुआ तो उनकी ज़ियारत के लिये मदीना चल पडीं और ज़ाहिर में लोगों से ये कहा कि मायके जा रही हूं। मायका मदीना के कबीला बनू नज्जार में था। अपनी नौकरानी उम्मे ऐमन और बेटे मुह्म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को लेकर मदीना में बनू नज्जार के दारुन्नाबिगा में ठहरी और शौहर की कब्र की ज़ियारत की। वापसी में शौहर की कब्र की ज़ियारत के बाद जुदाई का गम इतना घर कर गया कि अबवा के स्थान तक पहुचंते-पहुचंते वहीं दम तोड दिया। बाद में उम्मे ऐमन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को लेकर मक्का आयीं।

दादा-चाचा की परवरिश में :-   वालिदा के इन्तिकाल के बाद 74 वर्ष के बूढें दादा ने पाला पोसा। जब आप
                                                आठ वर्ष के हुये तो दादा भी 82 वर्ष की उम्र में चल बसे। इसके बाद चचा "अबू तालिब" और चची "हाला" ने परवरिश का हक अदा कर दिया। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सब से अधिक परवरिश (शादी होने तक) इन्ही दोनों ने की।
                            यहां यह बात ज़िक्र के काबिल है कि मां "आमिना" और चची "हाला" दोनो परस्पर चची जात बहनें हैं। वहब और वहैब दो सगे भाई थे। वहब की लडकी आमिना और वहैब की हाला (चची) हैं। वहब के इन्तिकाल के बाद आमिना की परवरिश चचा वहैब ने की। वहैब ने जब आमिना का निकाह अब्दुल्लाह से किया तो साथ ही अपनी लडकी हाला का निकाह अबू तालिब से कर दिया। मायके में दोनों चचा ज़ात बहनें थी और ससुराल में देवरानी-जेठानीं हो गयी। ज़ाहिर है हाला, उम्र में बडी थीं तो मायके में आमिना को संभाला और ससुराल में भी जेठानी की हैसियत से तालीम दी, फ़िर आमिना के देहान्त के बाद इन के लडकें मुह्म्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पाला पोसा। आप अनुमान लगा सकते हैं कि चचा और विशेषकर चची ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की परवरिश किस आन-बान और शान से की होगी एक तो बहन का बेटा समझ कर, दूसरे देवरानी का बेटा मानकर....।

आपका बचपन :-   आपने अपना बचपन और बच्चों से भिन्न गुज़ारा। आप बचपन ही से बहुत शर्मीले थे।
                               आप में आम बच्चों वाली आदतें बिल्कुल ही नही थीं। शर्म और हया आपके अन्दर कूट-कूट कर भरी हुयी थी। काबा शरीफ़ की मरम्मत के ज़माने में आप भी दौड-दौड कर पत्थर लाते थे जिससे आपका कन्धा छिल गया। आपके चचा हज़रत अब्बास ने ज़बरदस्ती आपका तहबन्द खोलकर आपके कन्धे पर डाल दिया तो आप मारे शर्म के बेहोश हो गये। दायी हलीमा के बच्चों के साथ खूब घुल-मिल कर खेलते थे, लेकिन कभी लडाई-झगडा नही किया। उनैसा नाम की बच्ची की अच्छी जमती थी, उसके साथ अधिक खेलते थे। दाई हलीमा की लडकी शैमा हुनैन की लडाई में बन्दी बनाकर आपके पास लाई गयी तो उन्होने अपने कन्धे पर दांत के निशान दिखाये, जो आपने बचपन में किसी बात पर गुस्से में आकर काट लिया था।

तिजारत का आरंभ :-  12 साल की उम्र में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपना पहला तिजारती सफ़र
                                   (बिज़नेस टुर) आरंभ किया जब चचा अबू तालिब अपने साथ शाम के तिजारती सफ़र पर ले गये। इसके बाद आपने स्वंय यह सिलसिला जारी रखा। हज़रत खदीजा का माल बेचने के लिये शाम ले गये तो बहुत ज़्यादा लाभ हुआ। आस-पास के बाज़ारों में भी माल खरीदने और बेचने जाते थे।

खदीजा से निकाह :- एक बार हज़रत खदीजा ने आपको माल देकर शाम भेजा और साथ में अपने गुलाम
                                  मैसरा को भी लगा दिया। अल्लाह के फ़ज़्ल से तिजारत में खूब मुनाफ़ा हुआ। मैसरा ने भी आपकी ईमानदारी और अच्छे अखलाक की बडी प्रशंसा की। इससे प्रभावित होकर ह्ज़रत खदीजा ने खुद ही निकाह का पैगाम भेजा। आपने चचा अबू तालिब से ज़िक्र किया तो उन्होने अनुमति दे दी। आपके चचा हज़रत हम्ज़ा ने खदीजा के चचा अमर बिन सअद से रसुल अल्लाह के वली (बडे) की हैसियत से बातचीत की और 20 ऊंटनी महर (निकाह के वक्त औरत या पत्नी को दी जाने वाली राशि या जो आपकी हैसियत में हो) पर चचा अबू तालिब ने निकाह पढा। हज़रत खदीजा का यह तीसरा निकाह था, पहला निकाह अतीक नामी शख्स से हुआ था जिनसे 3 बच्चे हुये। उनके इन्तिकाल (देहान्त) के बाद अबू हाला से हुआ था। निकाह से समय आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आयु 25 वर्ष और खदीजा की उम्र 40 वर्ष थी।

क्रमश: अगले भाग में जारी




अगर लेख पसंद आया हो तो इस ब्लोग का अनुसरण कीजिये!!!!!!!!!!!!!


"इस्लाम और कुरआन"... के नये लेख अपने ई-मेल बाक्स में मुफ़्त मंगाए...!!!!

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उम्दा जानकारी....! शुक्रिया

    इस हिन्दी ब्लाग जगत में आजतक किसी ने मुहम्मद साहब के जीवन के बारे इतनी गहरी तौर पर जानकारी नही दी है........

    तहेदिल से धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बहुत शुक्रिया इस अच्छी और पाक जानकारी के लिये.......

    आपको नया साल मुबारक हो.......

    उत्तर देंहटाएं
  3. तहेदिल से शुक्रिया काशिफ़ आपका.........

    हमारे नबी के जीवन के बारे में इतनी गहराई से शायद ही किसी को पता होगा इस हिन्दी ब्लाग जगत में.........

    हम सबको बताने के लिये आपका शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut umdaa jaankaari.........

    meri yahan hindi type nahi ho paa raha isliye roman me likhna padha........m sorry 4 this

    उत्तर देंहटाएं
  5. काफ़ी अच्छी जानकारी.........धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. भाई काशिफ यह जानकारियां तो सच्‍ची और खरी हैं, खयाल रखना हजरत आयशा का जरा तफसील से देना, वह अनुवाद सिंह आएगा और कहेगा वह 6 साल की थी जब निकाह हुआ, पता नहीं 9 को 6 उसने कैसे पढ लिया, और उस खुराक का भी जिक्र करना जो उनकी मां ने उनको खिलाई थी कि वह शादी की जिम्‍मेदारी के लायक हो जाएं जिससे उसकी लडकी को विश्‍व का सबसे अच्‍छा दूल्‍हा मिले

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह भाई वाह दूल्‍हा 25 वर्ष का विधवा दुल्‍हन 40 वर्ष की, क्‍या बात है लगता है नये साल में नये जोश से बुराईयों को दूर करना चा‍हते हो, खेर यह बात हम अवध वालों को नहीं बताऐंगे उन्‍हें पता है विधवा से विवाह न करने की बुराई को मुहम्‍मद सल्‍ल. ने दुर करवाया था

    अवधिया चाचा
    जो कभी अवध न गया

    उत्तर देंहटाएं
  8. .
    .
    .
    भाई काशिफ़ आरिफ़,

    उम्दा लेख, इस्लाम के बारे में सही जानकारी चाहने वालों के लिये काफी मददगार रहेगी यह सीरिज।

    आपको, आपके परिवार को और सभी पाठकों को नया साल मुबारक हो.......

    उत्तर देंहटाएं
  9. .
    .
    .
    प्रवीण भाई,

    आपको, आपके परिवार को और सभी पाठकों को नया साल मुबारक हो.......

    उत्तर देंहटाएं
  10. .
    .
    .
    उमर भाई बेफ़िक्र रहें...इन्शाल्लाह कोई बात गलत पेश नही होगीं और गलती से भी कोई गलती ना हो जाये इसका मैं ख्याल रखुंगा........

    आपको नया साल मुबारक हो

    उत्तर देंहटाएं
  11. काशिफ भाई , बहुत अच्छी जानकारी दी आपने, हमारे मामू आपको दुआएँ दे रहे हैं.लगे रहिए, कुछ आएँगे घटिया सोच वाले, उनकी आप फ़िक्र ना करना, मामू के पास हर मर्ज़ की दवा है
    HAPPY NEW YEAR 2010

    उत्तर देंहटाएं
  12. उम्दा लेख, इस्लाम के बारे में सही जानकारी चाहने वालों के लिये काफी मददगार रहेगी यह सीरिज

    उत्तर देंहटाएं
  13. भाई काशिफ साहब, ब्‍लागवाणी के नए रूप पर बधाई दो, मुझे लगता है यह अधिक कामयाब रहेगा, चटकों वाला मामला तो अब फेल, खेर तेल देखते हैं तेल की धार देखते हैं, नए साल के नए रूप में मैंने इसकी हिम्‍मत को टटोला यानि अपने ब्‍लाग दो ब्‍लाग चढाए इस पर एक नया एक पुराना देखते हैं आप ब्‍लागवाणी को सुझाव देके देखना तफसील यह दी थी आपके भी काम आएगी सुझाव देने में

    मुहम्‍मद उमर कैरानवी
    umarkairanvi@gmail.com
    http://umarkairanvi.blogspot.com/
    http://islaminhindi.blogspot.com/

    संदेश
    नए साल में नए रूप में नई सोच या होसला भी है या वही नए कपडों में पुराना दिल और दिमाग ही है, यह मेरा नया ब्‍लाग है अपनी शर्तें बताओ पालन किया जाएगा

    उत्तर देंहटाएं
  14. अच्छी सीरीज़ शुरू की है आपने नए साल के मौके पर. जिस तरह हमारे नबी को बदनाम किया जा रहा है और इस्लाम के खिलाफ साजिशें हो रही हैं, ऐसे में इस तरह की सीरीज़ लोगों को सच्चाई तक पहुंचाने में काफी मददगार होगी. इस पहले ही पार्ट से 'हर्फे गलत' की बात गलत हो गई जो वह कह रहा था की नबी की परवरिश अबू-लहब ने की थी.
    (एक बात और) शिया मतानुसार हमारे नबी को सिर्फ उनकी माँ ने ही दूध पिलाया था.

    उत्तर देंहटाएं
  15. अच्छी जानकारी आगे क इन्तज़ार रहेगा

    उत्तर देंहटाएं
  16. अच्छी जानकारी आगे क इन्तज़ार रहेगा

    उत्तर देंहटाएं
  17. उमर भाई, ब्लोगवाणी का नया रुप कल रात को ही देख लिया था.... पहले चन्द्र ग्रहण देखा उसके बाद ब्लोगवाणी का नया रुप देखा......

    इन्शाल्लाह बेफ़िक्र रहें ब्लोगवाणी आपको शामिल कर लेगी अगर नही करेगी तो हम हैं ना उनसे जवाब मांगने के लिये.....

    उत्तर देंहटाएं
  18. bhai bahut hi umda aur maalumaati post hai.insha allah agli post me aur cheezen kaiyon ke zehan ko saaf karengi.main apne net se pareshan hun.yun mera bhi iraada slaw pe anjuman par post karne ka tha khaas kar apne hindustaani bhaiyon ke liye unki hi zaban aur boli me.lekin aapne mera kaam aasan kar diya.shukriya.

    उत्तर देंहटाएं
  19. अस्सलामु अलैयकुम
    क्या आप जानते है की इस्लाम मे कॉपीराईट्स हराम है? इसमे सिर्फ वोह चीज़े ही शामिल नही है जो मज़हबी नोइयत की है बल्कि आम ज़िन्दगी मे भी किसी भी तरह के आर्थिक कोंट्रेक्ट मे कॉपिराईट्स की शर्त रखना हराम है.

    उत्तर देंहटाएं
  20. अस्सलाम अलैकुम
    इतनी अच्छी जानकारी पाकर बहुत ज्यादा खुशी
    हो रही है

    उत्तर देंहटाएं

आपको लेख कैसा लगा:- जानकारी पूरी थी या अधुरी?? पढकर अच्छा लगा या मन आहत हो गया?? आपकी टिप्पणी का इन्तिज़ार है....इससे आपके विचार दुसरों तक पहुंचते है तथा मेरा हौसला बढता है....

अगर दिल में कोई सवाल है तो पुछ लीजिये....

Related Posts with Thumbnails