शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

क्या हम किसी के कौल को अल्लाह और रसूल के कौल पर अहमियत दे सकते है? इस्लामी अकीदे से जुडें कुछ सवाल अन्तिम भाग Islam, Muslim, Muhammad, Allah, Quran, Messenger,

पिछ्ले भाग - 1,  भाग - 2, भाग - 3,  भाग - 4, भाग - 5, से जारी....


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सवाल :- क्या हम सिर्फ़ कुरआन को लेकर हदीस से बेपरवाह हो सकते है?

जवाब :- हम हदीस से बेपरवाह नहीं हो सकते।

कुरआन से दलील :- हमने तुम्हारी तरफ़ ज़िक्र यानी कुरआन नाज़िल किया ताकि लोगों से उस चीज़ को खोल खोल कर ब्यान कर दो जो उनकी तरफ़ नाज़िल किया गया है। (सूरह नहल सू. 16 : आ. 44)


हदीस से दलील :- खबरदार! मैं कुरआन दिया गया हूं और उसके साथ उस जैसी चीज़ (हदीस) दिया गया हूं। (अबूदाऊद)

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सवाल :- क्या हम किसी के कौल को अल्लाह और उसके रसूल के कौल पर अहमियत दे सकते हैं?



जवाब :- अल्लाह और रसूल के फ़रमान पर किसी के कौल को अहमियत नहीं दे सकते।

कुरआन से दलील :- ऐ ईमान वालो! अल्लाह और उसके रसूल से आगे बढने की हिम्मत ना करो। यानि दीन के मामले में अपने तौर पर कोई फ़ैसला ना करो ना किसी की समझ और राय को अहमियत दो। (सूरह हुजरात सू. 49 : आ. 1)


हदीस से दलील :- खालिक (अल्लाह) की नाफ़रमानी हो रही हो तो किसी मखलूक की इताअत जाइज़ नहीं (रवाहु तबरानी) अल्लाह की नाफ़रमानी करके किसी की इताअत जाइज़ नहीं, बेशक इताअत तो सिर्फ़ नेक कामों में है।
(मुत्तफ़क अलैह)

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सवाल :- जब आपस में इख्तिलाफ़ पैदा हो जाये तो क्या हम क्या करे?

जवाब :- जब इख्तिलाफ़ पैदा हो तो अल्लाह की किताब (कुरआन) और रसूल की सुन्नत (हदीस) पर अमल करें।

कुरआन से दलील :- अगर तुम आपस में किसी चीज़ के बारे में इख्तिलाफ़ करो तो अल्लाह और रसूल की तरफ़ जाओ। (सूरह निसा सू. 4 : आ. 59)


हदीस से दलील :- मैं दो चीज़ें छोडे जा रहा हूं जब तक उन पर अमल करते रहोगे कभी गुमराह नहीं हो सकते अल्लाह की किताब (कुरआन) और मेरी सुन्नत (हदीस)(मोअत्ता)

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सवाल :- क्या दीन में बिदअते हसना भी है?


जवाब :- दीन में कोई बिदअते हसना नहीं है।


कुरआन से दलील :- आज मैंने तुम्हारे लिये तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया है और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी। (सूरह मायदा सू. 5 : आ. 3)


हदीस से दलील :- दीन में नई चीज़े ईजाद करने से बचो क्यौंकि वह बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है। (अबूदाऊद)


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सवाल :- दीन में बिदअत किस को कह्ते है?

जवाब :- दीन में जो चीज़ नई ईजाद कर ली जाये और उसकी कोई दलील कुरआन व हदीस में ना हो और उसको सवाब समझकर किया जाये वह बिदअत है।

कुरआन से दलील :- क्या उन लोगों ने शरीक बना रखे है जो उनको दीन का वह रास्ता बताते हैं जिसका अल्लाह ने हुक्म नहीं दिया। (सूरह शूरा सू. 42 : आ. )


हदीस से दलील :- जिस किसी ने मेरे इस दीन में ऐसी चीज़ ईजाद की जो उसमें नहीं है तो वह मरदूद है। (मुत्तफ़क अलैह)



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सवाल :- क्या इस्लाम में सुन्नते हसना भी है?


जवाब :-  हां इस्लाम में सुन्नते हसना भी है, जैसे कोई सुन्नत मिट चुकी है तो उसको इस नियत से दोबारा ज़िन्दा कर दिया जाये ताकि लोग उस पर अमल करने लगें।

कुरआन से दलील :- और हमें परहेज़गारों का इमाम बना दे। (सूरह फ़ुरकान सू. 25 : आ. 74)


हदीस से दलील :- जिसने इस्लाम में किसी सुन्नते हसना को जारी किया उसको उसका सवाब मिलेगा और उसके बाद जो उस पर अमल करेंगे उनका भी सवाब उसे मिलेगा बगैर इसके कि उनके सवाबों में किसी तरह की कमी आये। (बुखारी)



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सवाल :- क्या इन्सान का सिर्फ़ अपनी खुद की इस्लाह करने को काफ़ी समझना सही है?

जवाब :- अपनी खुद की इस्लाह के साथ साथ दूसरों की इस्लाह भी ज़रुरी है।


कुरआन से दलील :- और तुम में एक जमाअत ऐसी होनी चाहिये जो लोगों को भलाई की तरफ़ बुलाये और बुराइयों से रोके। (सूरह आले इमरान सू. 3 : आ. 104)


हदीस से दलील :- कोई शख्स अगर बुराई को देखे तो उसे अपने हाथ से मिटा दे.............। (मुस्लिम)




अल्लाह हमें और आपको कुरआन, हदीस पढने, समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीफ़
अता फ़रमायें और हमें सही इस्लामी अकीदे पर कायम रखें।

आमीन, सुम्मा आमीन 




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9 टिप्‍पणियां:

  1. कुरआन से दलील :- ऐ ईमान वालो! अल्लाह और उसके रसूल से आगे बढने की हिम्मत ना करो। यानि दीन के मामले में अपने तौर पर कोई फ़ैसला ना करो ना किसी की समझ और राय को अहमियत दो। (सूरह हुजरात सू. 49 : आ. 1)

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  2. बहुत सही कहा आपने.....अल्लाह और रसूल के कौल के आगे किसी के भी कौल की कोई अहमियत नही है लेकिन आज का मुसलमान अल्लाह और रसूल के कौल के अलावा सबका कौल मान रहा है

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  3. इन्शाल्लाह इस जानकारी का इस्तेमाल करेंगे..

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  4. प्रिया जी,

    आपकी टिप्पणी का बहुत बहुत शुक्रिया....

    क्या बात है आजकल आप दिखाई नही दे रही है??

    ============

    "हमारा हिन्दुस्तान"

    "इस्लाम और कुरआन"

    Simply Codes

    Attitude | A Way To Success

    उत्तर देंहटाएं

  5. मुस्लिम शक्ल के साथ-साथ, अक्ल से भी बेवकूफ क्यों होते हैं..?
    क्या आपने कभी इस बात पर गहराई से सोचा है कि........ मुस्लिम चोरी, लूटमार, और बेईमानी पर आखिर इतना भरोसा क्यों करते हैं...????

    आपको यह जान कर काफी हैरानी होगी कि ... उन्होंने अपना धर्म से लेकर धर्मस्थान (काबा, जामा मस्जिद वगैरह) तक... चोरी से ही बनाई है.....!

    और तो और... उन्होंने तो देश तक ( पाकिस्तान, बांग्लादेश वगैरह ) बेईमानी से बना रखी है..!

    हद तो यह है कि.... उन्होंने मशहूर कब्रें तक भी लूट कर ही बनाई है (ताजमहल) ...!

    तो.. किसी के भी मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि ....आखिर इन सबका कारण क्या है.... और ये हर चीज लूट कर और बेईमानी कर के ही क्यों लेते हैं...... खुद का क्यों नहीं बनाते......????

    दरअसल.... इन सबका धार्मिक आधार होने के साथ साथ........ वैज्ञानिक आधार भी है.....!

    सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि.... कहीं भी .. कुछ भी... नया बनाने के लिए सबसे पहले दिमाग की जरुरत होती है.... जो कि इन बेचारों के पास होती ही नहीं है.....!

    अब मुस्लिम शक्ल के साथ-साथ, अक्ल से भी बेवकूफ क्यों होते हैं ... इसका एक भी एक ठोस वैज्ञानिक आधार है....!

    ये बात तो सर्वविदित है और अब वैज्ञानिकों द्वारा भी प्रमाणित है कि ....
    जिस समुदाय में अपने ही घर की मादाओं से शादी की जाती हो.... उस समुदाय का मानसिक विकास नहीं हो पाता है...!

    क्योंकि.... उसमे माता-पिता का गुणसूत्र (डीएनए) एक ही होता है...! उदाहरण के लिए मान लो कि.... किसी ने चचेरे या मौसेरे बहन से शादी कर ली (जो कि मुस्लिम अक्सर करते हैं) .. तो उनके नाना/दादा के गुणसूत्र एक ही हो जाते हैं और बच्चे का मानसिक विकास नहीं हो पाता है... और, ये बात जगजाहिर है कि.... मुस्लिमों में पवित्र या अपवित्र रिश्ता जैसा कुछ भी नहीं होता है.... उन्हें सिर्फ बच्चा पैदा करने से मतलब होता है ... चाहे वो अपनी बहन से करे, माँ, बुआ अथवा चाची से...! (यही कारण है कि .. मुस्लिमों को मदरसे में कुरान रटाया जाता है, ना कि समझाया जाता है) .
    वहीँ दूसरी तरफ.... हिन्दुओं में शादी, अपने रिश्तेदार तो खैर भूल ही जाओ.... पिछले सात पुश्तों तक को देख कर की जाती है.... परिणामस्वरुप माता-पिता के अलग-अलग गुणसूत्रों (डीएनए) के कारण आने वाले हिन्दू बच्चे में मानसिक विकास का दर काफी उच्च श्रेणी का होता है ...!
    और , शायद ये बात मुस्लिम भी समझते हैं कि ... वे तो मुर्ख हैं ही.. उनकी आने वाली नस्लें भी मुर्ख ही पैदा होनी है ....
    इसीलिए .... मुस्लिम चोरी, लूटमार, और बेईमानी पर ही आश्रित होते हैं .... और उसी को अपने जीवन का एक मात्र सहारा मानते हैं...!

    उत्तर देंहटाएं

आपको लेख कैसा लगा:- जानकारी पूरी थी या अधुरी?? पढकर अच्छा लगा या मन आहत हो गया?? आपकी टिप्पणी का इन्तिज़ार है....इससे आपके विचार दुसरों तक पहुंचते है तथा मेरा हौसला बढता है....

अगर दिल में कोई सवाल है तो पुछ लीजिये....

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