कुछ लोग है जो ये भी कहते है की कुरआन मजीद को अरबी मे पढना बिल्कुल ज़रुरी नही है सिर्फ़ तर्जुमा पढना ही काफ़ी है। एक मुस्लमान उस तरफ़ जा रहें है जो कह रहें है की कुरआन मजीद को समझ के पढों ही मत और दुसरी तरफ़ जो बहुत माड्र्न मुस्लमान है वो कहते है की अरबी मे पढ कर फ़ायदा क्या है? अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह निसा सु. ४ : आ. १७१ में "आप दीन के अन्दर जास्ती मत कीजिये" जास्ती का मतलब है की दायरे के बाहर मत जाइये। अरबी पढने के भी फ़ायदे है अल्लाह तआला फ़र्माता है सुरह अनकबुत सु. २९ : आ. ४५ में "आप पढों उस आयत को जो अल्लाह ने नाज़िल की इस किताब मे"। यानि अरबी मे पढना आपकॊ फ़ायदा पहुचायेगा। अल्लाह के नबी सल्लाहो अलैह वसल्लम फ़र्माते है "जो कोई एक हुर्फ़ कुरआन मजीद का पढता है उसे दस सवाब है" (१००३ : तिर्मिधी)। अल्लाह एक हुर्फ़ नही है "अलीफ़" एक हुर्फ़ है, "लाम" एक हुर्फ़ है, "ह" एक हुर्फ़ है, अगर आप अल्लाह पढेंगे तो आपको १० + १० + १० = ३० सवाब या नेकी मिलेंगी। अरबी पढने का भी सवाब है लेकिन हम हर रोज़ इतने गुनाह करते है, इतनी गलतियां करते है, तो क्या ये ३० नेकी काफ़ी है हमें जन्नत ले जाने के लिये? हमें अल्लाह के अज़ाब से बचाने के लिये? अगर आप कुरआन मजीद को पढेंगे, और समझेंगे, और अमल करेंगे तो सैकडों गुना सवाब मिलेगा। हदीस मे आता है इब्ने माज़ा अध्धाय. १६ : ह. २१९ अल्लाह के रसुल कहते है "या अबुदर तुम अगर एक आयत को समझोगें तो वो सौ रकात नफ़ील से बेहतर है"। अल्लाह के रसुल फ़र्माते है की एक आयत को समझोगे तो वो सौ रकात नफ़ील से बेहतर है, आप अगर नमाज़ पढेंगे तो कम से कम सुरह: फ़ातिफ़ा तो पढेंगे, एक रकात मे कम से कम सात आयते है तो सौ रकात मे सात सौ आयते हुई.........इसका मतलब एक आयत को समझ कर पढना सात सौ आयत को पढने से बेहतर है। इसका मतलब की आयत को समझना, आयत को पढने से सात सौ गुना बेहतर है।
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बुधवार, 1 जुलाई 2009
गुरुवार, 18 जून 2009
क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी है? भाग - २
आप लोगो ने मेरे इस लेख का पहला भाग पढा होगा। अगर नही पढा है तो यहां पढ सकते है।
हम मुस्लमान अक्सर बहाने बनाते है की हमारे पास कुरआन मजीद का तर्जुमा पढने का टाइम नही है। हम अपने रोज़-मर्रा के कामों मे मसरुफ़ है, अपनी पढाई मे, अपने कारोबार मे, वगैरह वगैरह। हम सब ये जानते है की जो भी वक्त हम स्कुल-कालेज मे लगाते है और कई किताबें हिफ़्ज़ (मुहं ज़बानी याद) कर लेते है, क्या हमारे पास कुरआन मजीद पढने का टाइम नही हैं? अगर आप कुरआन मजीद का तर्जुमा पढेंगे, चन्द दिनॊं मे पढ सकते है। लेकिन मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम फ़र्माते है :- "कि जो कोई तीन दिन से कम वक्त मे कुरआन मजीद को पुरा पढता है तो वो कुरआन मजीद को समझ कर नही पढता है" (२९४९, तिर्मिधी)। अगर आप सुकुन से पढेंगें तो इन्शाल्लाह आप सात दिन मे कुरआन मजीद के तर्जुमें को पुरा पढ लेंगे, अगर आप रोज़ कुरआन का एक पारा पढेगें तो एक महीने मे आप कुरआन को पुरा पढ लेंगें। जो डिगरी आप हासिल करते है स्कुल और कालेज जाकर वो आप को इस दुनिया मे फ़ायदा पहुचां सकती है और नही भी पहुचां सकती है क्यौंकी हम जानते है की कई डिग्री वाले बेकाम घुम रहे हैं लेकिन अल्लाह सुब्नाह व तआला वादा देते है की अगर आप इस कुरान मजीद को अच्छी तरह समझ कर पढेंगे तो आप को आखिरत मे ही नहीं इस दुनिया मे भी इन्शाल्लाह फ़ायदा होगा।
हम मुस्लमान अक्सर बहाने बनाते है की हमारे पास कुरआन मजीद का तर्जुमा पढने का टाइम नही है। हम अपने रोज़-मर्रा के कामों मे मसरुफ़ है, अपनी पढाई मे, अपने कारोबार मे, वगैरह वगैरह। हम सब ये जानते है की जो भी वक्त हम स्कुल-कालेज मे लगाते है और कई किताबें हिफ़्ज़ (मुहं ज़बानी याद) कर लेते है, क्या हमारे पास कुरआन मजीद पढने का टाइम नही हैं? अगर आप कुरआन मजीद का तर्जुमा पढेंगे, चन्द दिनॊं मे पढ सकते है। लेकिन मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम फ़र्माते है :- "कि जो कोई तीन दिन से कम वक्त मे कुरआन मजीद को पुरा पढता है तो वो कुरआन मजीद को समझ कर नही पढता है" (२९४९, तिर्मिधी)। अगर आप सुकुन से पढेंगें तो इन्शाल्लाह आप सात दिन मे कुरआन मजीद के तर्जुमें को पुरा पढ लेंगे, अगर आप रोज़ कुरआन का एक पारा पढेगें तो एक महीने मे आप कुरआन को पुरा पढ लेंगें। जो डिगरी आप हासिल करते है स्कुल और कालेज जाकर वो आप को इस दुनिया मे फ़ायदा पहुचां सकती है और नही भी पहुचां सकती है क्यौंकी हम जानते है की कई डिग्री वाले बेकाम घुम रहे हैं लेकिन अल्लाह सुब्नाह व तआला वादा देते है की अगर आप इस कुरान मजीद को अच्छी तरह समझ कर पढेंगे तो आप को आखिरत मे ही नहीं इस दुनिया मे भी इन्शाल्लाह फ़ायदा होगा।
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मंगलवार, 9 जून 2009
कुरआन का हिन्दी अनुवाद (तर्जुमा) .MP3 फ़ोर्मेट मे..।
आप सब लोगो के लिये काशिफ़ कि तरफ़ से एक तोह्फ़ा। मैने पुरे एक महिने की मेहनत के बाद कुरआन के हिन्दी अनुवाद (तर्जुमा) के .MP3 फ़ोर्मेट को मै इन्टरनेट पर अपलोड कर पाया ताकि इस को ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक पहुचा सकुं और जो मुस्लिम और गैर-मुस्लिम भाई अरबी भाषा नही जानते है वो कुरआन और इस्लाम के सही मतलब और मक्सद को समझ सके। तहे दिल से कुबुल करें कि कुरआन अल्लाह का कलाम है और अल्लाह के सिवा कोई पूज्ने यौग्य नही।
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